भारतीय संस्कृति संस्थान, फ्रांकफुर्ट ने अपने संस्थापक एवं पूर्व निदेशक डॉ. इन्दुप्रकाश पाण्डेय की 90वीं सालगिरह अक्टोबर 4, 2014 को फ्रांकफुर्ट, जर्मनी, में मनायी. इस समारोह में अनेक विद्वानों तथा विशिष्ट अतिथियों ने शामिल हो कर पाण्डेय जी की साहित्यिक एवं शैक्षणिक उपलब्धियों की सराहना कीं.

दक्षिण एशिया संस्थान, हाइडेलबर्ग विश्व विद्यालय के प्रॉ डॉ. डीटमार रोठरमुण्ड (ऐमेरिटस) ने पाण्डेय जी के दीर्घकालीन तथा अनेक देशों के विश्व विद्य़ालयों में शैक्षणिक अनुभवों का उल्लेख करते हुए यह बताया कि इन्होंने हिन्दी भाषा एवं साहित्य की कितनी महान सेवा की है. भाषा विज्ञान के प्रॉ.x डॉ. स्टेफ़ान त्सिमर ने अपने पूर्व अध्यापक की विद्यार्थियों को उत्प्रेरित और उत्साहित कर सकने की विलक्षण क्षमता की प्रशंसा की. ई.आ.एफ़., द्विराष्ट्रीय परिवारों की संस्था की मंत्री, हिल्ट्रूड स्ट्योकर-ज़ाफ़री ने पाँडेय जी की बौद्धिक उद्दातता एवं जीवन पद्धति की प्रशंसा की. भारत फ़ेराइन, फ्रांकफुर्ट की एक भारतीय संस्था के अध्यक्ष श्री पुलीप्रा ने पाण्डेय जी के सहयोग और संस्था के अध्यक्ष्य रूप में दीर्घकालीन सेवा के लिए बहुत सराहा. सुशीला शर्मा हक़, डौयचे वैले की पूर्व हिन्दी की कर्ता-धर्ता एवं हिन्दी शिक्षक, और फिलॉसफऱ जोहानेस गैस्ट्रिंग ने अपनी-अपनी तरह से पाण्डेय जी की तारीफें की. भारतीय संस्कृति संस्थान के नृत्य-विद्यार्थियों ने और तेलुगू-वेलगू संस्थान के शिष्यों ने सुन्दर नृत्य एवं गान प्रस्तुत किये.

महात्मा गांधी जी की जन्मतिथि, 2 अक्टोबर के पास ही 4 तारीख को, पाण्डेय जी की सालगिरह का मनाना एकमात्र संयोग ही नहीं था. पाण्डेय जी वस्तुतः तत्तकालीन स्वतंत्रता-संग्राम के सच्चे गवाह हैं, जिस में उन्होंने खुद भाग लिया और कई महीनें जेल में रहे.

1967 से पाण्डेय जी जर्मनी में रह रहे हैं. 1989 में अपने रिटायर होने तक इन्होंने जोहान वौल्फगांग गोएटे विश्व विद्यालय, फांकफुर्ट में अध्यापन किया. इन्होंने बीसियों किताबें लिखी हैं, जिन में लोकवार्ता तथा हिन्दी साहित्य पर विशेष रूप से.

पाण्डेय जी, जो उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे एक छोटे-से गाँव शिवपुरी में 4 अगस्त 1924 को पैदा हुए थे, ने अपनी 90वीं सालगिरह अलास्का में मनायी. एक बार कभी बहुत साल पहले हँसी-मज़ाक में कह दिया था कि वे अपनी 90वीं सालगिरह अलास्का में मनाएँगे, उस कथन का पालन करना ही पड़ा. उन के साथ अलास्का जानेवालों में उन के तीनों बेटे थे और उन का पोता भी था, जो सब कैलीफोर्निया में रहते हैं