स्वतंत्रता सेनानी डॉ. पाण्डेय ने गांधी जी के स्वराज और स्वदेशी  की अवधारणाओं पर अपने विचार शनिवार, फरवरी 1 को भारत फेराइन फ्रांकफुर्ट द्वारा आयोजित 66वें रिपब्लिक दिवस समारोह में व्यक्त किये. उन्होंने बताया कि स्वराज का अर्थ समाज का केवल ऊपरी नियंत्रण मात्र ही नहीं बल्कि आभ्यंतरिक अनुशासन भी है. उसी तरह स्वदेशी का भी व्यापक तात्पर्य है आत्म-निर्भरता और उत्पादन एवं वितरण पर स्वायत्त शासन

उन के तथा अन्य स्वतंत्रता सैनिकों के लिए गांधी जी के सत्य तथा अहिंसा सम्बन्धी विचारों का भी अत्यंत अधिक महत्व था, उन्हों ने आगे बताया. सत्य केवल अहिंसा के ज़रिये से हाँसिल हो सकता है और तभी व्यक्ति एवं समाज स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बन सकते हैं.

भावुक होते हुए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की अनेक ऐसी घटनाओं का ज़िक्र भी किया जिन में वे ख़ुद शामिल थे या जिन्हें अपने सामने होते हुए देखा था. 1931 में भगतसिंह की दिल दहलाने वाली फाँसी से ले कर 1942 के „भारत छोड़ो“ ( QUIT INDIA ) के आन्दोलन में गांधी जी के नारे, करो या मरो का अल्लेख करते हुए 1947 में आज़ादी की प्राप्ति तथा 26 जनवरी में भारतीय संविधान के लागू होने तक की चर्चा की. वह समय ही ऐसा था जिस में सर्वत्र आज़ादी का वातावरण था.

इस समारोह के मुख्य अतिथि कौंसिल जेनरल श्री रवीश कुमार जी थे.