हाइडेलबर्ग के द्रौपदी फर्लाग ने अगस्त 2012 में “बाऊजी और बन्दर” (Der Alte und die Affen)  नाम से आधुनिक भारत में वृद्ध होने की समस्या सम्बन्धी कहानियों के संकलन का प्रकाशन किया है। इन कहानियों का जर्मन अनुवाद इन्दु प्रकाश पाण्डेय और हाइडेमरी पाण्डेय ने किया है.

 

 

भारत में गत दशकों में तेज़ी के साथ होनेवाले आर्थिक विकासों एवम तत्सम्बन्धी सामाजिक परिवर्तनों की वजह से संयुक्त परिवार के समाद्रत पुरखे की परम्परागत भूमिका अब प्रायः चाल नहीं पा रही है. गो कि भारतीय वृद्धों के दिमागों मे अभी भी यह नमूना बना हुआ है.  परम्परागत अवधारणाओं और आधुनिक वस्तुस्थितियों के बीच, पैदा हुआ यही तनाव इन कहानियों में साहित्यिक रूप में अभिव्यक्त हुआ है.

तीन कहानियाँ, "बाऊजी और बन्दर", "दादी और रिमोट" और "क्रॉसिंग", मुम्बईवासी लेखिका सूर्यबाला की लिखी हुई हैं.  इस के अलावा मंजु मधुकर की "जहाँ का पीवे पानी...बानी", और ललन तिवारी की "पिता क्षमा करना", विभा देवसरे की "बग़ीचा", चन्द्रकिशोर जायसवाल की "मनबोध बाबू", शरद उपाध्याय की "प्रतीक्षा" और प्रेमपाल शर्मा की "श्रद्धांजलि"  इस संकलन में सम्मिलित की गयीं हैं. संकलन का प्रारम्भ ज़ाकिर खान की कविता, "मेरा बाप कह रहा है", से किया गया है, जो कहानियों की मूल समस्या को संक्षिप्त रूप में प्रकट करता है.